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बिहार बोर्ड 10वीं · हिंदी · मैट्रिक परीक्षा 2027

अध्याय 6: जनतंत्र का जन्म (रामधारी सिंह दिनकर) — नोट्स

इस अध्याय के 7 भाग, किताब के क्रम में — हर भाग की पहली बात और वे बिंदु जो मेधा मैम बोर्ड पर लिखती हैं — और अंत में सारांश। पूरा पाठ और हर भाग का जाँच-प्रश्न ऐप में।

  1. 1. कवि दिनकर और उनका परिचय

    देखिए, यह कविता लिखी है राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने।

    • • जन्म: 23 सितंबर 1908, सिमरिया, बेगूसराय
    • • निधन: 24 अप्रैल 1974
    • • पुरस्कार: साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ, पद्मविभूषण
    • • पहचान: उत्तर छायावाद के प्रमुख कवि
  2. 2. कविता का उद्देश्य और जनतंत्र का उदय

    यह कविता आधुनिक भारत में जनतंत्र के उदय का जयघोष है।

    • • कविता का विषय: जनतंत्र के उदय का जयघोष
    • • पृष्ठभूमि: सदियों की पराधीनता के बाद स्वतंत्रता
    • • भाव: जनता स्वयं सिंहासन पर आरूढ़ होने को है
    • • पंक्ति: सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी
  3. 3. जनता का पुराना दुखी रूप

    देखिए बोर्ड पर।

    • • जनता: मिट्टी की अबोध मूरतें
    • • सहती रही: जाड़े-पाले की कसक
    • • साँप चूसने पर भी मुँह न खोलना
    • • 'है प्रश्न गूढ़; जनता इस पर क्या कहती है?'
  4. 4. जनता को फूल या दुधमुँही समझने वालों का प्रतिवाद

    देखिए, कुछ लोग जनता को क्या समझते हैं?

    • • कुछ लोग मानते हैं जनता को फूल जैसा
    • • या दुधमुँही बच्ची जैसी (चार खिलौनों से बहलने वाली)
    • • कवि का प्रतिवाद: होता भूडोल, बवंडर उठते हैं
    • • जब जनता कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है
  5. 5. जनता की अजेय शक्ति और समय पर उसका नियंत्रण

    देखिए, कवि यहाँ जनता की ताकत की बात कर रहा है।

    • • हुंकारों से महलों की नींव उखड़ना
    • • साँसों के बल से ताज हवा में उड़ना
    • • 'जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ?'
    • • जनता जिधर चाहे, काल उधर मुड़ता है
    • • अब्दों-शताब्दियों का अंधकार बीता
    • • जनता के अजय स्वप्न तिमिर चीरते आते हैं
  6. 6. विराट जनतंत्र और तैंतीस कोटि जनता का अभिषेक

    देखिए बोर्ड पर।

    • • सबसे विराट जनतंत्र जगत का आ पहुँचा
    • • तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तैयार करो
    • • अभिषेक राजा का नहीं, प्रजा का है
    • • तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो
  7. 7. आज के देवता कौन हैं

    कवि अंत में पूछता है कि आरती लिए हुए तू किसे ढूँढता है, मूर्ख, मंदिरों, राजप्रासादों और तहखानों में?

    • • देवता मंदिरों-राजप्रासादों में नहीं मिलते
    • • देवता सड़कों पर गिट्टी तोड़ते मिलते हैं
    • • देवता खेतों, खलिहानों में मिलेंगे
    • • फावड़े और हल राजदंड बनने को हैं
    • • धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है

सारांश

चलिए, अब इस पूरे पाठ को एक बार फिर से याद करते हैं। रामधारी सिंह दिनकर की यह कविता है — 'जनतंत्र का जन्म'। यह आधुनिक भारत में जनतंत्र के आने की खुशी में लिखी गई है। सोचिए, सदियों की गुलामी के बाद जब आज़ादी मिली, तब यह कविता लिखी गई। कविता की शुरुआत में जनता को मिट्टी की अबोध मूरतें कहा गया है। यानी वह जनता जो हमेशा चुपचाप दुख सहती रही। कवि उन लोगों से असहमत हैं जो जनता को फूल या दुधमुँही बच्ची जैसा कमज़ोर समझते हैं। कवि कहते हैं, जब जनता को गुस्सा आता है, तो वह भूडोल जैसी ताकत दिखाती है — इतनी बड़ी ताकत कि उसे समय भी नहीं रोक सकता। आगे कवि कहते हैं, अब सबसे बड़ा जनतंत्र आ चुका है। इसमें राजा का नहीं, बल्कि तैंतीस कोटि प्रजा का अभिषेक होना है। और अंत में कवि कहते हैं, अब देवता मंदिरों में नहीं मिलेंगे। वे मिलेंगे सड़कों, खेतों और खलिहानों में मेहनत करने वालों में। फावड़ा और हल ही अब राजदंड बनने को हैं। अच्छा, अब आप बताइए — कविता के अनुसार जनता को पहले कैसा बताया गया था?

AskMedha · मेधा मैम — बिहार बोर्ड 10वीं हिंदी, अध्याय 6। पाठ्यपुस्तक से लिखा, दो बार जाँचा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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